जय हो निंदा रस
साहित्य के नौ रस श्रंगार, हास्य,
करुण, रोद्र, वीर, भयानक,
विभत्स अद्भतु और शांत
इनके अतिरिक्त एक ओर रस है
जो अनमोल है, मीठा है, प्रिय है।
वह है निंदा रस ।
समालोचना-आलोचना कब
विलीन हो जाती है
निंदा रस में
ज्ञात ही नहीं रहता है।
स्तुति असत्य हो सकती है।
परन्तु निंदा मे कुछ तो
सत्य निहित रहता ही है!
जो संतोष का अनुभव है
निंदा रस मे!
न किसी वार्ता मेँ, न किसी चर्चा
मे,
न किसी वाद –विवाद मे ओर ,
न ही किसी साहित्य मे !
प्रात: से संध्या, रात से दिन
तक
न जाने कितना समय व्यतीत हो जाता है,
परन्तु इसका रस कभी कम नहीं होता है
छिद्रान्वेषण पर निर्भर है
निंदा रस
निंदा यानी के पीठ पीछे,
त्रुटियो को अलंकृत कर बखान करना है
निंदा रस
एक दिन अचानक सोचा ?
एक नये सकारात्मक दृष्टिकोण से
व्यकितत्व के आकलन मे
कमियो के स्थान पर
गुण अधिक नज़र आने लगे है
स्वयं मे भी
कमियो के स्थान पर गुण
अधिक नज़र आने लगे है
निंदा रस के सहारे।
जय हो निंदा रस
जय हो निंदा रस
अमित
मेरी
कविताए स्वरचित व मौलिक है।
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