पहाड़ों की निस्तब्धता
क्यों उतर आती है
मेरे मन मे,
क्यों होता हूँ
बैचेन!
देवदार के उस पार जाने को-
क्यों होती है
भुजाओं मे फड़कन
पहाड़ो से लड़ने की
क्यों हो जाता हूँ
बेबस
जब मेरी रोटी का
रंग बदल जाता है
डाइनिंग टेबल पर!
पहाड़
क्यों छोड़ देता मुझे अकेला!
खुले आसमान मे
देवदार के सहारे-
तब क्यों नही रखता हूँ
पहाड़ लाँघने का
हौसला!
दूध का कटोरा जब होता है
खाली –
मेरे वंशधर का
तब क्यों नही बन पाता हूँ
मैं द्रोण ?
हाँ द्रोणचार्य
प्रतिशोध के बदले
क्यों उतर आता है
मेरी आंखों मे
बेबसी का पानी
आँख का पानी
किसी समस्या का हल नही है
लेकिन
फिर भी एक कोशिश है
एक ईमानदार कोशिश है
रेगिस्तान को
सिंचने की!
अमित
मेरी कविताए स्वरचित व मौलिक है।
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