Pages

Wednesday, 1 March 2017

स्टेशन


स्टेशन की भाँति स्थिर हूँ मैं
गाड़ियाँ आती-जाती है
नित्य नये यात्री
एक मैं हूँ
या स्टेशन की बैंच
जो वही कें वही है!

जिस पर जाकर
अक्सर  बैठता हूँ, मैं
अपने अकलेपन के साथ !
देखता हूँ भिन्न- भिन्न प्रकार
के यात्रियों को
लगता है जैसे दुनियाँ भाग रहीं है
धक्कामुक्की ,भीड़ भाड़,
आपा-धापीएक दूसरे को धकेलते  हुये
ट्रेन में चढ़ने की जल्दी 
हबड़ातबड़ीअंदर पहुच कर ,
शायद कोई जंग जीत ली हो ,
आभास होता है चेहरे देख कर
व्यर्थ का शोर गुल हैं 
बाहर,
अंदर है वीराना!
फिर भी न जाने क्यों-
बुनता हूँ कुछ सुनहरे सपने !
स्टेशन की बैंच पर बैठ कर-...
ना वो  टूटती है
ना ही मैं  टूटता हूँ

कभी तो मेरी बारी आयगी !
गाड़ी में सवार होने की
सोच के ये अडिग हूँ मैं 
स्टेशन की भाँति स्थिर हूँ मैं
अपने सपनों के साथ ,
जो पूरे होगें ! अवश्य होगें।


अमित,






No comments:

Post a Comment

प्रवासी मजदूर!

प्रवासी कौन है ? प्रवासी का शाब्दिक अर्थ है जो अपना क्षेत्र छोड़ काम धंधे के लिये, एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में  में निवास करता है अर्थात...