स्टेशन की भाँति स्थिर
हूँ मैं
गाड़ियाँ आती-जाती
है
नित्य नये यात्री
एक मैं हूँ
या स्टेशन की बैंच
जो वही कें वही है!
जिस पर
जाकर,
अक्सर
बैठता हूँ, मैं
अपने
अकलेपन के साथ !
देखता हूँ भिन्न-
भिन्न प्रकार
के
यात्रियों को
लगता है
जैसे दुनियाँ भाग रहीं है
धक्का–मुक्की ,भीड़ –भाड़,
आपा-धापी, एक दूसरे
को धकेलते हुये
ट्रेन
में चढ़ने की जल्दी
हबड़ा–तबड़ी, अंदर
पहुच कर ,
शायद कोई
जंग जीत ली हो ,
आभास
होता है चेहरे देख कर
व्यर्थ
का शोर –गुल हैं
बाहर,
अंदर है वीराना!
फिर भी न
जाने क्यों-
बुनता हूँ कुछ
सुनहरे सपने !
स्टेशन
की बैंच पर बैठ
कर-...
कभी तो
मेरी बारी आयगी !
गाड़ी में सवार होने की
सोच के
ये अडिग हूँ मैं
स्टेशन की भाँति स्थिर
हूँ मैं
अपने
सपनों के साथ ,
जो पूरे
होगें ! अवश्य होगें।
अमित,

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