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Monday, 27 February 2017

बेटियाँ


माँ के राज में,
राज करती हैं बेटियाँ
खिल खिला कर हँसती हैं
तितलियों की भाँति
स्वच्छन्द उड़ती हैं
खेलती-कूदती हैं

माँ के आँचल मे सुरक्षित
होने के भ्रम में...
जीती हैं बेटियाँ
कभी बड़ी नही होती हैं बेटियाँ
माँ के राज में!


माँ ने भी बहुत कुछ सहा हैं
जब वो बेटी थी
समाज के आचार-विचार
व तौर-तरीकों के बहाने
फिर क्यो नहीं बना पाती हैं
एक माँ अपनी बेटी को
सबल?

जब बेटियों के साथ कुछ
घटित होता है....
क्यो नही बन पाती है
उसकी ढ़ाल, उसकी आवाज,
उसका साहस-
क्यों नही निजात दिला पाती है 
इस सोच से कि
बेटी होना एक अभिशाप हैं!

क्यों करती हैं एक माँ
बेटे की अभिलाषा?
शायद इसलिए
कभी ना कभी माँ ने भी वो सब सहा है...
जब वो बेटी थी

आचार-विचार सड़ी-गली
मान्यताओं के आधार पर

बस बहुत हुआ, अब
उठो!
हे!  मातृ-शक्ति...
ढ़ाल नहीं, तलवार बनाओं
बेटियों को
अपनी हो या परायी। 

सत्य.....
जानते हुये भी क्यो मौन हैं
हे दुर्गा-वाहिनी!
बेटी के स्वर मे स्वर मिला
विस्तार दो, आवाज़ को...
हे मातृ-शक्ति...
क्या बेटी होना अपराध है!
क्यो नहीं समझ पाता हूँ । 



अमित

मेरी कविता स्वरचित व मौलिक है।

Friday, 17 February 2017

अटूट एकता


एक दिन टहलते हुए देखा
श्वान के नवजात बच्चों को
सर्द ठण्ड मे अपनी माँ से
गुथे हुए देखा...
बर्फीली हवाओ से वचाव के वास्ते
एक दूसरे के सहयोग से
अपनी उर्जा के रिसाव
को अवरुद्द कर
भीषण ठण्ड को पराजित करने मे
सफल हो रहे हैं।

कुछ समयांतराल बाद
श्वान के बच्चे
अपनी माँ के बिना
सभी बच्चे आपस मे
गुथ कर अपनी एकत्रित
ऊर्जा से ठण्ड को पराजित करने में
सक्षम हो रहे हैं।

शायद माँ ने बच्चों को सक्षम
होने के लिए ही अकेला छोड़ा हैं

अचनक विचार कौंधा!
हम भी अपनी संगठित एकाग्र
ऊर्जा से
किसी भी परिस्थिति को
पराजित करने में सक्षम हैं।
अत: हम सब एक हैं।

मर्ज भी हम हैं
मरीज भी हम हैं
दर्द भी हम हैं
दव़ा भी हम हैं
हकीम भी हम ही हैं
एकता के एक सूत्र मे बंध
अटूट चट्टान भी हम ही हैं

अमित
मेरी कविता स्वरचित व मौलिक है।


Wednesday, 25 January 2017

विचारो की पुर्नावृत्ति


उसने कुछ ऐसा कहा,
ऐसी शब्दावली का प्रयोग किया 
ऐसे सुर का प्रयोग किया
जो मुझे अप्रिय है,
जो मेरे अनुकूल नहीं है

उन्होने कहा सिर्फ एक बार,
मात्र एबार 
मेरे मन ने मुझसे कहा
कितनी बार?
उस वार्तालाप को...
मेरे मन ने कितनी बार
पुर्नावृत्ति की एक बार, 
बार-बार, अनेक बार
एक पल, एक छण, एक दिन 
या फिर वर्षो तक!

उनके सुर ने आहत किया
मेरे अर्न्तमन को एक बार
मैंने अपने को आहत किया 
कितनी बार?
बार-बार अनेक बार...
विचारों के पैण्डुलम ने 
कितनी बार आयामों की आवृत्ति की!

विचारा, मनन किया, सोचा ,
मुझे क्या ग्रहण करना है? 
क्या नहीं ?
मेरे अर्न्तमन में, 
कौन प्रवेश करेगा, कौन नहीं ? 
कौन सी भावनायेंकौन से शब्द, 
कौन सी ध्वनि
कर्कश अप्रिय, वार्तालाप या 
फिर स्वयं के अर्न्तमन की मधुरध्वनि।

ये निर्णय मेरा है 
किसका प्रवेश वर्जित है,
किस का नहीं,  
ये मेरा, सिर्फ मेरा ही फैसला है।

मैं उनके शब्द ग्रहण करू 
या फिर छोड़ दूँ !

ऐसे ही सन्नाटे में...
उनको ही कचोटने के लिए 
उनके की शब्द,
उनकी कर्कश ध्वनि!
ऐसे ही सन्नाटे में...

अप्रिय वार्तालाप, 
उनकी कर्कश ध्वनि
उनकी कर्कश ध्वनि तो 
बस एक तरंग हैं मात्र !

मेरा अपने अर्न्तमन पर
मेरा स्वयं का नियंत्रण है

किन्तु यह भी सत्य  है
उनके शब्द, उनकी  भावना ,
उनकी कर्कश ध्वनि,
उन्ही मे ही सृजित हुई है
अत: वह उनकी ही  सम्पत्ति  है
उनके ही पास है ।

मैं उसे धारण करूँ अथवा नहीं
ये मेरा ,सिर्फ मेरा फैसला है
और यही सच है।



अमित
मेरी कविताए स्वरचित व मौलिक ह

Thursday, 19 January 2017

जय हो निंदा रस



जय हो निंदा रस
साहित्य के नौ रस श्रंगार, हास्य,
करुण, रोद्र, वीर, भयानक, 
विभत्स अद्भतु और शांत
इनके अतिरिक्त एक ओर रस है 
जो अनमोल है, मीठा है, प्रिय है।
वह है निंदा रस ।

समालोचना-आलोचना कब
विलीन हो जाती है 
निंदा रस में
ज्ञात ही नहीं रहता है।

स्तुति असत्य हो सकती है।  
परन्तु निंदा मे कुछ तो
सत्य निहित रहता ही है!
जो संतोष का अनुभव है 
निंदा रस मे!
न किसी वार्ता मेँ, न किसी चर्चा मे,
न किसी वाद –विवाद मे ओर ,
न ही किसी साहित्य मे !

प्रात: से संध्या, रात से दिन तक
न जाने कितना समय व्यतीत हो जाता है,
परन्तु इसका रस कभी कम नहीं होता है
छिद्रान्वेषण पर निर्भर है 
निंदा रस
निंदा यानी के पीठ पीछे,
त्रुटियो  को अलंकृत कर बखान करना है
निंदा रस

एक दिन अचानक सोचा ?
एक नये सकारात्मक दृष्टिकोण से
व्यकितत्व के आकलन मे
कमियो के स्थान पर 
गुण अधिक नज़र आने लगे है
स्वयं मे भी
कमियो के स्थान पर गुण 
अधिक नज़र आने लगे है
निंदा रस के सहारे। 

जय हो निंदा रस
जय हो निंदा रस
अमित
मेरी कविताए स्वरचित व मौलिक है।

Monday, 12 December 2016

कविता लिखने का फंडा



कविता लिखने का शौक जब चर्राया
तब वरिष्ठ कवि ने नुस्खा है फरमाया
शब्द रस अलंकर नही किसी के होते
भाव भावना  भी समाज से हम लेते


किसी  प्रतिष्ठित कवि की  शैली चुराओ
शब्दों को जोड़तोड़  कर कविता बनाओ
इधर उधर से  भाव और शब्दों को तोड़ा
इस  प्रकार  हमने  कविताओं  को जोड़ा


कविता रच हम मंच पर सुना रहे थे
पैर सूखे पेड़ के पत्ते  से काँप रहे थे
आवाज़ भी साथ नहीं दे  रही थी
हालत बद से बदतर हो रही थी


देख हमेंकन्याएं मंद -मंद मुस्का रहीं थी
मित्रों को ये अदा सहन नही हो पा रही थी
मित्र ताली पीट -पीट  खिल्ली उड़ा रहे थे
श्रोता  गफलत में  तालियां   बजा रहे थे

फ्लॉप होते- होते , बॉक्स ऑफिस पर हिट हो गये
अन्ततोगत्वा,कवियों की जमात में शामिल हो गये |

अमित
मेरी कविताए स्वरचित व मौलिक है।






Thursday, 8 December 2016

वृक्ष की व्यथा



मत लिखो मुझ पर
कोई कविताकहानी या आलेख
नही गढ़ों कोई कलाकृति              
नही करोमेरे संरक्षण के लिए
आन्दोलन धरना या प्रदर्शन
बस रहने दो ऐसे ही सन्नाटे में!


जहाँ नही पहुँच सके
कविलेखक और संरक्षक के ठेकेदार?
क्योकि समस्त प्रक्रिया में
मेरा ही बलिदान होगा
या फिर  उपयोग होगा
मेरे ही अंगों का
मत जलाओ मेरे अवशेषों को...
बस रहने दो ऐसे ही सन्नाटे में !


ताकि धरा को पोषित व उर्वर बना
मिटा सकूँ मानव की भूख ?
रहने हो बस मुझे ऐसे ही अकेला
जंगल की अनेक जाति प्रजातियों के संग
विकास के नाम पर मत परिवर्तित करो
मुझे कंक्रीट के जंगल में
बस रहने दो ऐसे ही सन्नाटे में !


ताकि उत्सर्जित कर सकूँ प्राण वायु
आपके लिए
बस रहने दो ऐसे ही सन्नाटे में !
नितांत अकेला 
अमित
मेरी कविताए स्वरचित व मौलिक है। 

प्रवासी मजदूर!

प्रवासी कौन है ? प्रवासी का शाब्दिक अर्थ है जो अपना क्षेत्र छोड़ काम धंधे के लिये, एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में  में निवास करता है अर्थात...