आत्मा
एक शहीद की
देखने
वास्ते तस्वीर
अपने
देश की !
विचरती
हुयी आयी
जनपथ
बिजनौर की
नगर
पालिका
हल्दौर
में !
विस्मित
हुई देख
खण्डर
को !
अनुमान
लगाया सहज !
हड़प्पा
के अवशेष !
आकर
देखा नजदीक !
आशियाने
में खण्डर के !
बनी
हुई है चरागाह !
आश्रय
में उसके खेलकर ताश
कर
रहे लोग मनोरजंन !
और
नजदीक आ के देखा
एक
शिला पर उभरे है
कुछ अक्षर, ज्ञात हुआ यह है
"शहीद स्मारक "
जो
पहुँचने की तैयारी कर रहा है
अगली
सदी में !
तथापि
हिम्मत न हारते हुए
पाषाण
को नवीन में
बदलने
के लिए
जगह-जगह
दिये आवेदन-पत्र !
सिसक
रही है अब इंतजार में !
मुझे
डर है कही फिर से
शहीद न हो जाए
एक
शहीद की आत्मा !
अमित
मेरी कविता स्वरचित व मौलिक है।

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