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धरा को घूर्णन
गति से चलने की,
भास्कर को उदय
होने की,
नीर को नीरद में परिवर्तित होने की,
आतुरता नही
व्याकुलता नही।
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ऋतु को
परिवर्तित होने की,
समय को व्यतीत
होने की,
अनवरत सॉसों की
चिर विराम की
पंच-तत्वों को विलीन होने की,
आतुरता नही
व्याकुलता नही।
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प्रकृति को
किचिंत व्यग्रता नही,
व्याकुलता नही, आतुरता नही,
समग्र
प्रक्रिया चरणबद्ध है
एक संतुलन है।
फिर क्यों इतने
अधीर हैं,
अमित विकल हैं !
हम!
किरणों का अवनि
से स्पर्श भी,
समय बद्ध हैं।
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तत्परता उचित,
अधीरता अनुचित,
न खोने को न
पाने को
लेश मात्र भी
चिर स्थायी नही है।
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फिर क्यों ?
भयभीत हैं आप
और हम
व्यर्थ-आरोप, प्रत्यारोप...
आवश्यक है।
आत्मचिंतन,आत्ममंथन
हॉ मंथन से ही
प्राप्त होगा
अमृत, मित्र ।
आत्ममंथन से ही
प्राप्त होगा अमृत मित्रो।
अमित
मेरी कविता स्वरचित व मौलिक है।
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Saturday, 16 July 2016
प्रकृति के नियम (Nature 's Laws)
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