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Saturday, 16 July 2016

प्रकृति के नियम (Nature 's Laws)


धरा को घूर्णन गति से चलने की,
भास्कर को उदय होने की,
नीर को नीरद में परिवर्तित होने की,
आतुरता नही व्याकुलता नही।

ऋतु को परिवर्तित होने की,
समय को व्यतीत होने की,
अनवरत सॉसों की चिर विराम की
पंच-तत्वों को विलीन होने की,
आतुरता नही व्याकुलता नही।

प्रकृति को किचिंत व्यग्रता नही,
व्याकुलता नही, आतुरता नही,

समग्र प्रक्रिया चरणबद्ध है
एक संतुलन है।
फिर क्यों इतने अधीर हैं,
अमित विकल हैं !
हम!
किरणों का अवनि से स्पर्श भी,
समय बद्ध हैं।

तत्परता उचित,
अधीरता अनुचित,
न खोने को न पाने को
लेश मात्र भी चिर स्थायी नही है।

फिर क्यों ?
भयभीत हैं आप और हम
व्यर्थ-आरोप, प्रत्यारोप...
आवश्यक है। आत्मचिंतन,आत्ममंथन  
हॉ मंथन से ही प्राप्त होगा
अमृतमित्र ।
आत्ममंथन से ही प्राप्त होगा अमृत मित्रो।

                                                                              अमित
मेरी कविता स्वरचित व मौलिक है।




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