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आखिर
कौन हूँ मैं ?
या
फिर मात्र एक शरीर !
शरीर
भी विसर्जित हो,
पचं-तत्व में विलीन हो जाता है।
लेकिन
फिर भी शेष रह जाता है
मेरा
स्वम् का अस्तित्व।
मैं हूँ एक ज्योतिमय
बिन्दू !
एक शुन्य !
जिसका ओर ना छोर
न आदि न अन्त
दृष्टा हूँ मैं
चैतन्य अविनाशी अक्षय
ऊर्जा हूँ मैं ।
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आन्नद, खुशी, सुख, शान्ति
सब मेरे अन्दर निहित हैं
बस अपने ऊपर ओढ़े अनेक
आवरणों को हटा...
वातायन के पट खोलने की देरी है बस...
सब खुशीयों का खजाना है हमारा है
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मै एक आत्मा हूँ
खुदा का नूर हूँ
जीज़स की लाइट हूँ
गुरू का प्रकाश हूँ
अनुमान नही,एक अनुभव है
अनुभूति है, मै
एक आत्मा हूँ
अज़र अमर अविनाशी आत्मा हूँ ।
अमित
मेरी कविता स्वरचित व मौलिक है।
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