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Saturday, 9 July 2016

मेरी परिकल्पना







ओ मेरी परिकल्पना की रानी
जैसे गगन से बरसा हो पानी

गंगा के तट की संध्या सी
खिले गुलाब  के अधर सी


हिमालय से अवतरित किरन सी
मेरे ऑगन मे महकते "सुमन" सी

तिमिर का विसर्जन करती चादंनी
सुगंध विखेरती मेरी रात की रानी

बाँज़-बुरास की शीतल छाँव सी
मेरी सहचरी   प्रेरणादायनी सी

सहज करती राहें पथरीली
मेरे सपनों के आकार सी

  
जीवन सँवारती हुयी मेरी रागनी
ओ मेरी  परिकल्पना की रानी
अमित/18.05.95
मेरी कविता स्वरचित व मौलिक है

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